कतील शिफाई का जन्म 1919 में हुआ था। ये अपनी मोहब्बत भरी ग़ज़लों के लिए जाने जाते हैं। कुछ इधर-उधर से बटोरीं गए कुछ कलाम
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अपने होठों पे सजाना चाहता हूँ ।
तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ ।
कोई आंसूं तेरे दामन पर गिरा कर
बूंद को मोती बनाना चाहता हूँ
थक गया मैं याद करते करते तुझको
अब याद तुझे में आना चाहता हूँ
आखरी हिचकी तेरे जानों पे आये
मौत भी में शायराना चाहता हूँ
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व्यंग्य भी बहुत खूब ही करते थे कतील, उदाहरण के तौर पर इन पंक्तियों को लीजिये, जो किसी hypocrite को बखूबी बयान करती हैं
उन को भी है किसी भीगे हुए मंज़र की तलाश
बूँद तक बो ना सके जो कभी सहराओं में
सहरा: Desert
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और ये पंक्तियाँ देखिये, जो बहुत खूबसूरती से मंदिर-मस्जिद संस्कृति को सिरे से नकारती है
वो ख़ुदा है किसी टूटे हुए दिल में होगा
मस्जिदों में उसे ढूँढो न कलीसाओं में
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1 comments:
March 12, 2010 at 4:51 AM
the frst 1 is really heart touching n bakki mujhe theek se samjh nahi aayiiii....
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